छत्तीसगढ़ के जनजातिय क्षेत्रो में लघु वनोपज के विपणन में सप्ताहिक बाजार की भूमिकाः बस्तर संभाग के सदंर्भ में
विद्यासागर सिंह1, अषोक कुमार पटेल2
1शोध छात्र, अर्थषास्त्र अध्ययन शाला, पं. रविषंकर शुक्ला विष्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
2शोध छात्र, अर्थषास्त्र विभाग, बी.सी.एस. शासकीय महाविद्यायल, धमतरी (छ.ग.)
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू ंेीवातेन90/हउंपसण्बवउ
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छत्तीसगढ़ में जनजातिय आदिवासियों की बड़ी संख्या निवास करती हैं, कुल जनसंख्या में 78,22,102 लोग जनजातिय परिवारो से आते हैं। छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र हैं। यहां पर आदिवासी जनजाति निवास करती हैं। इनके जीवको पार्जन, रोजगार, आय का प्रमुख साधन कृषि एंव लघुवनोपज हैं। यहां पर व्यवसायिक महत्व के लगभग 72 प्रकार के लघुवनोपज उपलब्ध हैं। इनके विपणन के लिये ये जनजाति आदिवासी परिवार सप्ताहिक बाजार जिसे हाॅट के नाम से जाना जाता हैं पर पूर्णतः निर्भर रहते हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में लघुवनोपज के विपणन में सप्ताहिक बाजार की भूमिका का अध्ययन किया गया हैं।
ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू जनजाति, जीवकोपार्जन, लघुवनोपज विपणन।
प्रस्तावना -
बस्तर संभाग जनजातिय आदिवासियों का प्राकृतिक आवास क्षेत्र रहा हैं। बस्तर छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण में फैला विशाल भू-भाग है जो घने-जंगलो व पर्वत श्रृखंलाओ से अच्छादित हैं। इसमें आने वाले सभी 7 जिले बस्तर संभााग हैं। अविभाजित मध्यप्रदेष में बस्तर संभाग एक जिला हुआ करता था। उस समय यह मध्यप्रदेष का सबसे बड़ा व भारत का दूसरा सबसे बड़ा जिला था।
अपनी अलग संस्कृति एंव प्राकृतिक विविधता के कारण इस जिले को छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद प्रषासनिक राजस्व संभाग के रूप में पहचान मिली। छत्तीसगढ़ राज्य के अनुपातिक रूप से अध्ययन करने पर ज्ञात होता हैं, कि इस क्षेत्र में राज्य के सबसे अधिक जनजातिय आदिवासी जनसंख्या (अनुपातिक प्रतिषत में) निवास करती हैं। छत्तीसगढ़ की जनसंख्या में 30.6 प्रतिषत जनजातिय लोग हैं, इनकी कुल जनसंख्या 78,22,102 हैं। जिसमें ग्रामीण - 72,31,082 एंव शहरी- 5,91,820 जनजातिय आदिवासी समुदाय अपना जीवन यापन के लिये पूर्णतः कृषि और लघुवनोपज पर आश्रित हैं ;ज्ञींतम 1998द्ध। बस्तर के वनों में औषधीय एवं गैर औषधीय महत्व के लगभग 700 पौधे के प्रजातियां उपलब्ध है। जिसमें से वाणिज्यिक महत्व के लगभग 30-35 लघुवनोपज प्रजातियों का ही विदोहन किया जाता है। शेष लघुवनापजों की जानकारी अत्यल्प या उपलब्ध नहीं है। इस बात को ध्यान में रखते हुये अध्ययन के लिये उक्त विषय का चुनाव किया गया हैं।
बस्तर में लगभग 75 प्र्रतिशत जनजातिय एवं अन्य ग्रामीण समुदाय अपने भोजन के पुरक के रूप में कंद,मुल,फुल एवं फल पर वर्ष पर्यन्त निर्भर रहते है ;थ्ंसबवदमत 1993द्ध। बस्तर के जनजातिय परिवार अपने जीवकोपार्जन के लिये कृषि एंव वनोपज पर निर्भर हैं। महिलाएं लघु वनोपज की प्रमुख संग्राहक है जो लघुवनोपजों के संग्रहण से लेकर विपणन तक समस्त क्रियाओं में महत्वपुर्ण भूमिका निभाती है ;भ्ंेंसांतए टममदं 2004द्ध। कृषि से प्राप्त उपज व वनो से संग्रहीत वनोपज को ये प्रायः सप्ताहिक बाजार जिसे वे हाॅट के नाम से सम्बोधित करते हैं, में बिचौलियों के पास बेंच देते हैं। भारत के अधिकांष वनांनचंल क्षेत्र की ग्रामीण जनसंख्या लघुवनोपजों के कुल संग्रहण का 60 प्रतिषत उपभोग करने के पष्चात शेष मात्रा की बिक्री द्वारा आय की प्राप्ति होती है ;च्तंेंक 1994द्ध। जनजातियां व्यापारियों से अपनी आवष्यकता की वस्तुओं का क्रय कर, इन व्यापारियों द्वारा निर्धारित दरों पर बिना किसी अविष्वास के अपने उत्पादों का विक्रय करते हैंै ;डंतवजीपलंए ळंनतंीं 1992द्ध। आज भी इस क्षेत्र में लघुवनोपज संग्रहण की सहकारी व गैर सरकारी दोनो तरह की संस्थाओं की भारी कमी हैं। अतः वनोपज के विक्रय व विपणन हेतू आदिवासीयों के पास बिचैलिये व सप्ताहिक बाजार के विकल्प हीं बचते हैं। लघुवनोपज संग्राहकों द्वारा अराष्ट्रीकृत लघुवनोपजों का विपणन मध्यस्थों द्वारा लागु की गई कीमतोें पर ग्रामीण प्रतिनिधि/फुटकर/थोक विक्रेता द्वारा किया जाता है ;ैंगमदं 1975द्ध। परिणामतः समाज का एक बड़ा वर्ग विषेषतः जनजातिय क्षेत्र प्रभावी विपणन पद्धति से मिलने वाले लाभों से वंचित रह जाते है ;त्ंव 1988द्ध। विविध उत्पाद, अनिश्चित उत्पादन एवं अपुर्ण बाजार लघु वनोपजों के प्रबंधन के बाधा उत्पन्न करते है ;ज्पूंतप 2000द्ध।
सप्ताहिक बाजार छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं, बस्तर में तो सप्ताहिक बाजार के बिना लोगो की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की कल्पना हीं नही की जा सकती हैं। वनोपज जीवन के उपयोग की सभी वस्तुयें सप्ताहिक बाजारों से ही क्रय करते हैं। बस्तर संभाग में 200 से भी ज्यादा सप्ताहिक बाजार होतें हैं। सभी सप्ताहिक बाजार पर न्यूनतम 10 ग्राम व अधिकतम 50 ग्रामों तक के निवासी निर्भर रहते हैं। सप्ताहिक बाजार जनजातिय परिवारांे के लिये केवल सामग्री उपलब्धता का स्थान नही हैं, ये सप्ताहिक बाजार उन्हें अपने कृषि उपज एंव लघुवनोपज को बंेच (विक्रय) कर आय प्राप्त करने का अवसर भी उपलब्ध कराता हैं।
अध्ययन के उद्देष्यः
अध्ययन के उद्देष्य निम्न हैः
1 अध्ययन क्षेत्र के लघुवनोंपज को जानना व इसके विपणन पद्धति को समझना।
2 अध्ययन क्षेत्र के सप्ताहिक बाजार एंव उसके स्वरूप को समझना।
3 लघुवनोंपज विपणन में सप्ताहिक बाजार, सहाकारी संस्था एंव बिचौलियों की भूमिका जानना।
4 लघुवनोंपज के विपणन सुधार हेतू समाधान व सुझाव ज्ञात करना।
अध्ययन की सीमाएंः
1 यह अध्ययन केवल लघुवनोपज के विपणन सम्बधिंत हैं।
2 यह अध्ययन केवल विपणन के साधन बाजार, सहाकारी संस्था व बिचैलियो तक सीमीत हैं।
3 अध्ययन क्षेत्र व बाजार का चयन न्यादर्ष के आधार पर हैं।
शोध प्रविधिः
प्राथमिक समंको का संकलन प्रष्नावली एंव साक्षात्कार से किया गया हैं, तथा द्वितीयक आंकड़े जिनका प्रयोग शोध पत्र में किया गया हैं, उनके संकलन हेतू सरकारी रिपोर्ट का पत्रिका व अन्य प्रकाषित साहित्यों से लिया गया हैं।
अध्ययन क्षेत्र एंव न्यादर्ष चुनावः
अध्ययन हेतु बस्तर संभाग के बस्तर व नारायणपुर जिला का चुनाव किया गया हैं, बस्तर संभाग में कुल जनसंख्या में 20,69,155 जनसंख्या आदिवासीयों की हैं। जो अधिकांषता जीवकोपार्जन हेतू कृषि व लघुवनांेपज संग्रहण करते हैं। इन जिलांे में से दो-दो बाजार क्रमषः (जगदलपुर, बस्तर) जिले से बकावंड व तोकापाल एंव नारायणपुर, अबुझमाड़ से कोहकामेटा एंव सोनपुर बाजार का चयन अध्ययन के लिये किया गया हैं। अध्ययन वर्ष 2017 के नवम्बर-दिसम्बर व 2018 के जनवरी माह के मध्य में किया गया हैं।
विष्लेषण तथा वर्गीकरणः
वृहद् रूप से वनोपज को दो भागो में वर्गीकृत किया गया हैं। काष्ठ एंव अकाष्ठ या लघुवनोपज छत्तीसगढ़ राज्य लघुवनोपज संघ के वार्षिक प्रतिवेदन के अनुसार राज्य में व्यवसायिक महत्व की लगभग 72 अराष्ट्रीयकृत तथा 7 राष्ट्रीयकृत लघुवनोपज प्रजातिंया पाई जाती हैं। जिनका उपयोग व विपणन वर्तमान में किया जाता हैं। उपलब्धता के आधार पर छत्तीसगढ़ राज्य में राष्ट्रीयकृत लघुवनोपज की संख्या 07 अराष्ट्रीयकृत गैर औषधीय लघुवनोपज की संख्या 30 एंव अराष्ट्रीयकृत औषधीय लघुवनोपज की संख्या 42 है। इन सब का अनुमानित वार्षिक व्यापार 500 करोड़ से भी अधिक हैं।
लघुवनोपज ग्रामिणों की जीविका एवं आय का प्रमुख स्त्रोत है। बस्तर संभाग में जनजातीय परिवारो द्वारा संकलित लघुवनोपज का विपणन वे सप्ताहिक बाजार हाॅट में करते हैं। ये बाजार उनके निवास ग्राम के आस-पास समीप में होते हैं। छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीयकृत लघुवनोपज के विपणन हेतू राज्य स्तर पर लघुवनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाता हैं। परन्तु राज्य के राष्ट्रीयकृत लघुवनोपजो को छोड़ दिया जाये तो बाकी के सभी अराष्ट्रीयकृत लघुवनोपज जिसकी उपलब्धता अधिक हैं, के विपणन की संगठित व्यवस्था नहीं हैं।
व्नोपजः
अघ्ययन कि दृष्टि से बस्तर संभाग के लघुवनोपज को हम निम्न प्रकार में विभक्त कर सकते है
(1) काष्ठ वनोपज ;ज्पउइमत थ्वतमेज च्तवकनबमद्ध
(2) अकाष्ठ या लघुवनोपज ;छवद ज्पउइमत थ्वतमेज च्तवकनबम वत डपदवत थ्वतमेज च्तवकनबमद्ध
;ंद्ध राष्ट्रीयकृत ;छंजपवदंसपेमक थ्वतमेज च्तवकनबमद्ध
;इद्ध अराष्ट्रीयकृत ;छवद छंजपवदंसपेमक थ्वतमेज च्तवकनबमद्ध
उपरोक्त सारणी से लघुवनोपज के प्रकार उनका वैज्ञानिक नाम एंव संग्रहण काल के साथ-साथ औसत रोजगार दिवस ज्ञात होता हैं।
विपणन सम्बंधी निष्कर्षः
विपणन प्रणाली तब तक योग्य एवं प्रभावपुर्ण नहीं हो सकती जब तक वह समाज के विभिन्न वर्गों की आवष्यकताओं की पूर्ति नहीं करती। भारत में विपणन पद्धति विकसित नहीं है। बस्तर संभाग में लघुवनोपज का विपणन चक्र निम्न प्रकार से चलता है:-
प्राथमिक संग्राहक → ग्रामीण प्रतिनिधि → प्रारंभिक थोक विक्रेता → फुटकर विक्रेता → द्वितीय थोक विक्रेता → कमीषन प्रतिनिधि → उपभोक्ता ।
चित्र -विपणन चक्र
अध्ययन क्षेत्र लघुवनोपज संग्राहकों एवं स्थानीय साप्ताहिक बाजार/हाॅट में निरीक्षण से विपणन संबंधी निम्न निष्कर्ष सामने आते है।
1 सर्वेक्षण से न्यादर्ष परिवारो के साक्षात्कार से पता चलता हैं कि 90-95 प्रतिषत लोग अपने द्वारा संग्रहीत लघुवनोपज (अराष्ट्रीयकृत) को साप्ताहिक बाजार हाॅट में बेचते हैं।
2 न्यादर्ष बाजार हाॅट में ग्रामीण जनजातिय लोगो से साक्षात्कार से पता चलता हैं। 70-75 प्रतिषत लोग अपने पहचान और पारम्परिक परिवारिको सें सम्बस्थित बिचौलियों को मजबूरी में अपने वनोपज को विक्र्रय करते हैं।
3 लगभग सभी जनजातीय परिवार व साक्षात्कार में शामिल हुये जनजाती लोग से पता चलता हैं कि उन्हें उनके लघुवनोपज का उचित मुल्य प्राप्त नहीं हो पाता।
4 सप्ताहिक बाजार में लघुवनोपज विक्रय हेतु आये हुये जनजातीय ग्रामीण परिवारो से पता चलता हैं, श्रम अनुरूप लघुवनोपज का मुल्य न मिल पाने के कारण यह अलाभकारी कार्य हैं।
5 ग्रामीण जनजाति परिवारो में सभी परिवारोे से पता चलता हैं की लघुवनोपज संग्रहण से पुर्ण रोजगार प्राप्त नहीं होता हैं।
6 जनजातीय परिवार लघुवनोपज को सहकारी संस्थाओं की अपेक्षा सप्ताहिक बाजार हाॅट में बेचते हैं।
7 लघुवनोपज विपणन के प्रमुख अंग सप्ताहिक बाजार में उपस्थित थोक विक्रेताओ से पता चलता हैं कि स्थानीय लोगो को संग्रहण के सही तरीकें ज्ञात नहीं हैं। अभी भी अल्प काल के भंडारण के लिये ये अपने पारंपरिक तरीके को अपनाते है। स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण की सुविधा नहीं होने के कारण भी लघुवनोपज का उचित मुल्य आदिवासीयों को प्राप्त नहीं हो पाता।
न्यादर्ष ग्राम के जनजातीय परिवारो व स्थानीय सप्ताहिक बाजार हाॅट में व्यपारियो से साक्षात्कार में स्पष्ट हो जाता हैं कि लघुवनोपज के विपणन में सप्ताहिक बाजारो की अहम भूमिका हैं। विपणन हेतू सहकारी संस्थाओं की कमी, सहकारी संस्थाओ व जनजातीय परिवारो के बीच का आसामंजस्य भी सप्ताहिक बाजार को लघुवनोपज के विपणन हेतू सुविधाजनक व सरल बनाता हैं। ग्रामीणो के पहुंच के समीप होने के कारण भी जनजातीय परिवार सप्ताहिक बाजारो को अधिक पंसद करते हैं। सप्ताहिक बाजार हाॅट में सभी आवष्यक वस्तुुये उपलब्ध होने के कारण ग्रामीण बाजार जाते हैं। अतः अलग से अन्य स्थान पर लघुवनोपज के विक्रय के स्थान पर उन्हें सप्ताहिक बाजार में विक्रय करना ज्यादा पसंद हैं।
अर्थात् अध्ययन से स्पष्ट होता हैं की सप्ताहिक बाजार पूरे लघुवनोपज व्यापार की प्रमुख कड़ी हैं। ग्रामीणो के संग्रहण लघुवनोपज को अन्य उत्पादनो हेतु मुल बाजार में लाने का कार्य में साप्तहिक बाजार हाॅट ही निभा रहे हैं। फिर भी साप्तहिक बाजारों में लघुवनोपज विपणन को संगठित एंव पारदर्षी बनाने हेतू प्रयास होने चाहिए ताकि जनजातीय परिवारो को लघुवनोपज का उचित मूल्य मिल सके।
सुझावः
इस परिप्रेक्ष में निम्न सुझाव पे्रषित हैः-
1. लघुवनोपज संग्रहणकर्ता को जागरूक कर इसके संग्रहण पद्धति, भण्डारण व रख-रखाव उचित प्रषिक्षण देना चाहिएं।
2. लघुवनोपज के राष्ट्रीय बाजार के मूल्यों का प्रदर्षन समय-समय पर ग्रामीण क्षेत्रो में होना चाहिए ताकि आदिवासियो को लघुवनोपज का सही मूल्य प्राप्त हो सके।
3. सहकारी संस्थाओ व सरकारी सोसायटी में सभी प्रकार के लघुवनोपज की खरीदी होनी चाहिए।
4. लघुवनोपज विपणन को सरकार द्वारा संगठित रूप देना चाहिये, एंव इनके संग्रहण कर्ताओं को विषेष योजनाओं में शामिल कर लाभ देना चाहिए।
5. सभी लघुवनोपज के लिये न्युनतम समर्थन मूल्य घोषित कर सप्ताहिक बाजार के थोक विक्रेताओ को इसके पालन हेतू नियम बनाना चाहिये।
6. निष्चित रूप से लघुवनोपज विपणन को सप्ताहिक बाजार हाॅट से अलग या परे रख कर कार्य नही किया जा सकता लेकिन लघुवनोपज के विपणन पध्दति व स्वरूप में मूल भूत सुधार की आवष्यकता हैं।
ग्रंथ सूचीः
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Received on 04.08.2018 Modified on 24.08.2018
Accepted on 06.09.2018 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(3):297-301.